• January 5.2021

  • भावना जगवानी

दुनिया मे जब कोई खुद से हार कर जीत जाता है, तो वो दूसरे के सामने अपने हार को प्रस्तुत तो जरूर करता है। मगर उसका तरीका बदल जाता है। वो सोचता है कि मैं जो दुख किया हूं यहीं दुख मैं दूसरों को होने नहीं दूंगा। दरअसल, यह कहानी राजस्थान जयपूर के 55 वर्षीय भावना जगवानी की है। बता दें कि भावना जगवानी की 1992 में गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में थीं, जब उन्होंने दवा की प्रतिक्रिया के कारण अपनी आंखों की रोशनी खो दी थी।

जब वे 27 साल की थी तब उनके पैरों तले जमीन खिसक गई, जब डॉक्टरों ने घोषणा की कि वह अपने बच्चे को कभी नहीं देख सकती। लगभग 25 दिनों के बाद उनकी रोशनी वापस आ गई। लेकिन अंधेरे में बीते इन 25 दिनों ने उन्हें जीवन में एक नया उद्देश्य दे दिया।

जगवानी, जिन्होंने 10 साल बाद जयपुर का पहला नेत्र बैंक स्थापित किया, कहती है, जब डॉक्टरों ने मुझे बताया था कि मैं फिर से नहीं देख पाऊंगी, तो मुझे सदमा लगा। मैं बस फर्श पर बैठ कर ध्यान करती। यह एक बहुत दर्दनाक अनुभव था। लेकिन हर चीज में एक उद्देश्य होता है। 2002 में, जगवानी ने राजस्थान की नेत्र बैंक सोसायटी की स्थापना की। कॉर्निया संग्रह के प्राथमिक उद्देश्य के साथ स्थापित, टीम पिछले 18 वर्षों में राजस्थान में लगभग 14,000 नेत्र दान सुनिश्चित करने में सक्षम रही है।

अभियान के कारण, जगवानी ने 2014 में राजस्थान में कैडेवर आॅर्गन डोनेशन और ट्रांसप्लांट प्रोग्राम शुरू किया और एक गैर सरकारी संगठन, मोहन फाउंडेशन – जयपुर सिटीजन फोरम (एमएफजेसीएफ) की स्थापना की। मेरे बेटे के जन्म के तुरंत बाद, मैंने अपनी आँखें दान करने के लिए नेत्रदान केंद्र की तलाश शुरू कर दी थी। मैं जानती थी कि मेरे परिवार में या मेरे दोस्तों के अलावा किसी और की तुलना में आंखों की रोशनी का मूल्य अधिक है। यह तब था जब उन्हें पता चला कि जयपुर में कोई नेत्र बैंक नहीं था। आपको बता दें कि भारत मे करीब 1.25 करोड लोग दृष्टिहीन है। इसमें से करीब 30 लाख व्यक्ति नेत्ररोपण द्वारा दृष्टि पा सकते हैं।

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