• December 4.2020

  • सुदीप दत्ता

दोस्तों जीवन में जब जिंदगी अपने इम्तिहान लेना शुरू करती तब व्यक्ति का असली रूप सामने आता है की वो इस इम्तिहान का किस तरह सामना करता है कई लोग इस स्थिति में खुद को संभाल नहीं पाते तो कुछ लोग इस दौरान कुछ ऐसा कर गुजरते है की वो पूरी दुनिया के लिए मिशाल बन जाते है दोस्तों ऐसी ही एक शख्सियत है, म्े क्मम। सनउपदपनउ स्ज्क् कंपनी के फाउंडर सुदीप दत्ता जो एक समय इस कंपनी में मजदूरी का कार्य करते थे और रोज के 15 रूपये से यहां काम करते थे।

दोस्तों रोज 15 रूपये मजदूरी से काम करने वाले सुदीप दत्ता आज 1600 करोड़ की कंपनी के मालिक है दोस्तों आज हम सुदीप दत्ता की इस सक्सेस के बारे में जानने वाले की कैसे उन्होंने अपने हार्ड वर्क से इस मुश्किल कार्य को आसान बना दिया तो चलिए दोस्तों इसकी शुरुआत करते है.साल 1972 में पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर के छोटे से गांव में सुदीप दत्ता का जन्म हुआ था उनके पिता इंडियन आर्मी में थे लेकिन सुदीप दत्ता के जीवन में मुश्किलों का दौर बचपन में ही शुरू हो गया था जब साल 1971 में इंडो पाक युद्ध छिड़ा तब उनके पिता को गोली लग गई और उन्हें लकवा हो गया तब उनके परिवार पर संकटो का बोझ आ गया पूरा घर अब उनके बड़े भाई पर निर्भर हो गया था और अब वही घर का अब एकमात्र साहरा थे लेकिन उनके परिवार के पीछे समस्या लगी ही रही थोड़े दिन बाद उनके बड़े भाई का भी स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और वे बीमार हो गए घर में उनकी बीमारी का इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं होने के कारण उनके भाई की भी मौत हो गई अपने बड़े बेटे की मौत का सदमा सुदीप के पिता भी ज्यादा दिन नहीं सह पाते और उनकी भी मौत हो जाती है घर में इन परिस्थितियों के चलते महज 17 साल की छोटी सी उम्र में पुरे घर का बोझ सुदीप दत्ता के कंधो पर आ जाता है वो हर रोज अपनी जिंदगी से जंग लड़ अपने परिवार की देखभाल कर रहे थे। परिवार में आयी इन परिस्थितियों के चलते सुदीर दत्ता को अपने परिवार चलाने के लिए कुछ तो करना था या तो अपनी पढ़ाई छोड़ कर कही मजदूरी करना या फिर किसी होटल पर चाय बनाना लेकिन उन्होंने जिंदगी बदलने के लिए अलग ही तरीका सोचा उन्होंने अपने दोस्तों की सलाह ली और फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन की स्टोरी से प्रभावित हो कर मुंबई के लिए निकल पड़े सुदित दत्ता बताते है की बचपन से ही कुछ अलग करने का सपना देखने वालो को जीवन की ये परिस्थिया कुछ करने का मौका देती हैसाल 1988 में मुंबई जाने के बाद उन्होंने रोज 15 रूपये की मजदूरी वाला काम ढूंढा और काम करना शुरू कर दिया वहां वे पैकिंग लोडिंग और डिलवरिंग का कार्य करते थे इस काम को करते हुए वो इस कार्य की बिजनेस के बारे में जानने लगे थे उस कंपनी में उनके साथ समान काम करने वाले कुल 12 मजदुर थे वो समय उनके जीवन का कठिन समय था एक ही कमरे में सभी लोगो का रहना खाना पीना होता था ऐसी स्थिति में उन्होंने करीब 3 साल वहां गुजारे 3 साल बाद यानी 1991 में सुदीप दत्ता जिस कंपनी में काम कर रहे थे उस कंपनी के मालिक को बिजनेस में भारी नुकसान हो गया और तब कंपनी के मालिक ने इस फैक्ट्री को बंद करने का निर्णय लियाऔर दोस्तों यही से शुरू हुई सुदीप दत्ता की स्टोरी सुदीप ने इस मौके को जाने नहीं दिया और अपनी आज तक की बचत और दोस्त रिश्तेदारों से मांग कर कुल 16000 रूपये जमा कर इस फैक्ट्री के मालिक के पास इसे खरीदने के लिए पहुंच गए लेकिन दोस्तों इतनी बड़ी फैक्ट्री को महज 16000 रूपये नहीं खरीदा जा सकता था लेकिन दूसरी और फैक्ट्री मालिक बिजनेस में हुए नुकसान से परेशान था इस वजह से वो उन रुपयों में ही मान गए लेकिन इसके लिए उस कंपनी मालिक ने सुदीप के सामने दो शर्ते रखी पहली शर्त थी की अगले दो साल तक इस कंपनी को जो भी मुनाफा होगा वो इस फैक्ट्री के मालिक को देना होगा और इस शर्त के लिए सुदीप तैयार हो जाते है एक समय था जब वो इस कंपनी में मजदुर बन कर आये थे और आज वो उसी कंपनी की मालिक बन गए है लेकिन कहानी यही नहीं खत्म हुई थी अब उनके खंधो पर परिवार और कंपनी को खरीदने के लिए जो पैसा उधार लिया था उसकी जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गई थी।

जब उन्होंने इस एलुमिनियम पैकेजिंग इंडस्ट्री की कंपनी को खरीदा था तब यह इंडस्ट्री एक बुरे दौर से गुजर रही थी उस समय इस इंडस्ट्री के शेयर केवल दो ही कंपनियों के हाथ में थे पहली थी जिंदल लिमिटेड और दूसरी थी इंडिया फॉयल ये दोनों कंपनिया मार्केट में काफी बड़ी और मजबूत थी और एक छोटी सी कंपनी जो हाल ही में बर्बादी के कगार पर खड़ी थी उसे लेकर इन दो बड़ी कंपनियों से मुकाबला करना उनके सामने एक चुनौती थी तब मार्केट में पैकेजिंग को लेकर आयी नई तकनीक को अपने साथ जोड़कर मार्केट में अपनी पहचान जमाने लगे उन्होंने कभी भी अपनी उम्मीदों को नहीं हारने दिया और लगातार एक साल तक मेहनत करते रहे और हर प्रोजेक्ट में वो खुद कंपनी को इस बारे में समझाते थे की उनकी कंपनी की पैकेजिंग मार्केट में चल रही बाकि कंपनियों से अलग हैऐसे ही उन्होंने छोटी छोटी कंपनियों से आर्डर लेना शुरू किया और अपनी कंपनी का काम चालू किया धीरे धीरे उनकी कंपनी मार्केट में मजबूत होने लगी तब उनको ैन्छ च्भ्।त्ड। और छमेजसम जैसी बड़ी कंपनियों से काम मिलने लग गयातब से सुदीर जी को अपने जीवन में कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा और यही समय था। जब वो पहली बार जीवन में सफलता की सीढ़िया चढ़ना शुरू हुए थे की मार्केट में अनिल अग्रवाल की वेदांता कंपनी ने पैकेजिंग इंड्रस्टी में कदम रखता है उस दौर में वेदांता बड़ी कंपनियों की लिस्ट में शामिल था और इतनी बड़ी कंपनी के साथ मार्केट में मुकाबला करना सुदीप जी के लिए एक बड़ी चुनौती था लेकिन सुदीप जी ने इस हालात से निराश न होते हुए अपने प्रोडक्ट में और अधिक मेहनत की और अपने प्रोडक्ट को और बेहतर बनाया आखिर में वेदांता कंपनी को सुदीप दत्ता के आगे हार माननी पड़ी और साल 2008 में सुदीप जी ने 130 करोड़ रूपये देकर अनिल अग्रवाल से उनकी वेदांता कंपनी खरीद लिया सुदीप जी के जीवन का ये सबसे बड़ा फैसला था।

इतनी बड़ी कंपनी के मालिक बनने के बाद भी सुदीप रुकते नहीं है और अपने प्रोडक्ट पर मेहनत करते रहते है और खुद की फर्मा पैकेजिंग इंडस्ट्री में पहचान बनाने में लग जाते है साल 1998 से 2000 तक उन्होंने कलकत्ता से लेकर 12 बड़े शहरो में अपने प्रोडक्ट यूनिट की स्थापना की दोस्तों आज सुदीप दत्ता की म्ैै क्म्म् ।स्न्डप्छप्न्ड च्टज् स्ज्क् कंपनी भारत की पैकेजिंग फिल्ड में नंबर 1 कंपनी बन चुकी है और दोस्तों थोड़े समय बाद वर्ल्ड की दो टॉप पैकेजिंग में भी सुदीप दत्ता की कंपनी शामिल होने वाली है साथ ही आज इनकी कंपनी बॉम्बे स्टॉक और नेशनल स्टॉक में भी अपनी जगह बना चुकी हैउनके पैकेजिंग फिल्ड में बेहतर सोच के लिए नारायण मूर्ति भी कहा जाता है दोस्तों आज वर्तमान में उनकी कंपनी की मार्केट वेल्यू 1600 करोड़ रूपये से भी अधिक है अपने जीवन में इतना कुछ हासिल करने के बाद भी आज भी वो एक साधारण व्यक्ति की तरह अपना जीवन जीते है और इस बात का सबसे बड़ा सबूत ये है की आज भी उनकी कंपनी में काम करने वाले लोग उन्हें दादा कहकर बुलाते है उन्होंने अपने जीवन से सीखकर गरीब और असहाय लोगो के लिए सुदीप दत्ता फॉउंडेशन भी खोली है दोस्तों हमें सुदीप दत्ता सक्सेस स्टोरी से एक सीख मिलती है की जीवन में कैसी भी परिस्थिति हो उससे हार न मानते हुए उसका सामना करना चाहिए किसी ने सही कहा है जो लोग संघर्ष के दौर में कोशिश करना नहीं छोड़ते उनको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

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