• October 31.2020

  • वर्षा गोयल

एक लड़की की ज़िन्दगी में शादी के बाद कई बदलाव आ जाते हैं, ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ।

शादी होने के पहले से ही मुझे किताबें पढ़ने का बहुत शोक था और शुरू से ही मैं स्पॉट्स की भी अच्छी खिलाड़ी थी। मेरी शादी एक मारवाड़ी घर में हुई। मैं घर की सबसे बड़ी बहु थी और मेरी सास को मुझ से बड़ी उंमीदे थी। मेरी ससुराल वालो के दिमाग के किसी कोने में कहि ये बैठा हुआ था की जो पढ़ी लिखी बहुएं होती है वो सुनती नहीं है। इसी सोच की वजह से उन्हें मेरा किताबे पढ़ने से परहेज था और मैं थी की जब तक मेरे हाथ में किताब न हो तो मुझ से कोई काम भी नहीं होता था। मुझे खाना बनाते वक्त, सोने से पहले, जब भी कभी समय मिले मुझे किताब चाइये होती थी।

मुझे यह आदत पड़ी क्यूँकि मेरे मायके में सभी को पढ़ाई का बहुत शौक था। लेकिन ससुराल में सासु माँ को ये फ़िक्र थी की बहु ज़्यादा पढ़ेगी तोह कही बिगड़ न जाए।

एक दिन की बात है की मैं घर में खाना बना रही थी और मेरे हाथ में किताब थी। इतने में ही मम्मी जी रसोई में आयी और मुझे पड़ता देख बोली की “सही कहते है लोग की ये किताबें पढ़ – पढ़ केर ही तुम्हारा दिमाग खराब हो रहा है। मुझे समझ नहीं आता की किताबों में ऐसा क्या है। ” उन्होंने झट से मेरे हाथ से किताब ली और उसके दो टुकड़े कर दिए। एक सेकंड के लिए तो मुझे बहुत गुस्सा आया, मगर फिर मुझे लगा की क्यों न इस गुस्से को एक ज़िद्द बना लिया जाए। बचपन में मेने एक खानी सुनी थी कि जब महात्मा गाँधी जी को साउथ अफ्रीका में रेल की डिब्बे से फेंख दिया गया था तो उन्होंने कहा था की मैं अपने इस गुस्से को ज़िद्द बना लूंगा और जैसा तुमने मुझे इस डिब्बे से फेंका है मैं भी तुम अंग्रेज़ो को अपने देश भारत से बाहर फेंकू गा। और यह काहनी मुझे उस वख्त याद आ गयी जब मम्मी जी ने मेरी किताब को फाड़ दिया था। फिर मैंने भी सोचा की आज मुझे किताब पढ़ने से टोका है तो क्यों न मैं इसको अपनी ज़िद्द बना लूँ। फिर मैंने मुस्कराते हुए अपनी सासु माँ को बोला की आपने मेरी ये किताब रखीं हैं तो आज से मैने भी अपनी किताबें साइड में रख दीं, लेकिन एक दिन ऐसा आएगा की मैं अपनी एक किताब लिखूं गी और उसका विमोचन मैं आपके हाथो ही कराऊंगी।

समय बीतता गया, कुछ साल निकल गए गेहरासती में लेकिन मन में जो सपना था किताब लिखने का वो जीवित रहा। कई परिस्थितियाँ आयी लेकिन मैंने अपनी ज़िद्द न छोड़ी।

मुझे आज भी वो दिन याद है, वो हिंदी भवन की स्टेज, खचा खच भरा हुआ ऑडिटोरियम और वहाँ मेरी किताब ‘ खुद से दो बातें ‘ का विमोचन हो रहा था और मुझे बहुत गर्व महसूस हो रहा था जब मैंने अपनी सासु माँ को स्डेज पर बुलाया और मेंने कह की मेरी किताब का प्रोत्साहन मुझे इनसे मिला है। उस दिन मैंने अपनी ज़िद्द को पूरा किया।

ये ही है, मेरी कहानी ज़िद्द की – मुझे किताब पढ़ने से मना किया गया और मैंने अपनी खुद की किताब ही लिख डाली।

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