• October 29.2020

  • अशोक कुमार कपूर

एक खुशाल ज़िन्दगी पर सब का हक़ है , परन्तु कुछ शारारिक दिक्कतों की वजा से लोग इस ज़िन्दगी का पूर्ण रूप से लुफ्त नहीं उठा पाते। हम लोग औरों को अपने अंग दान कर जीवन प्रदान कर सकते है और उनको ज़िन्दगी जीने का एक और मौका दे सकते है। मैंने अपने जीवन के उतार चढ़ाव तथा बीमारियों से लड़ते हुए ये अनुभव किया कि स्वास्थ ही जीवन है। मरने के बाद हमारे सभी अंगों को खाक में मिल जाना है। कितना अच्छा हो कि मरने के बाद ये अंग किसी को जीवनदान दे सकें। अगर धार्मिक अंधविश्वास आपको ऐसा करने से रोकते हैं तो महान ऋषि दधीचि को याद कीजिए, जिन्होंने समाज की भलाई के लिए अपनी हड्ड़ियां तक भी दान कर दी थीं। उन जैसा धर्मज्ञ अगर ऐसा कर चुका है तो आम लोगों को तो डरने की जरूरत ही नहीं है। सामने आइए और खुलकर अंगदान कीजिए, इससे किसी को नई जिंदगी मिल सकती है।

27 वर्षो से स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया मै नौकरी करके अब मैं रिटायर हो चूका हूँ। अब उम्र के इस मुकाम पर पोहंच कर एक बात का एहसास हुआ कि ज़िन्दगी बहुत छोटी है और हम अपनी ज़िन्दगी से औरो का भल्ला कर सकते है तो इससे अच्छा और कुछ नहीं। इंसान को एक बात कभी नहीं भूलनी चाइये की ज़िन्दगी अमर नहीं है, एक दिन मौत आनी है और हमे मिटटी मैं मिल जाना है। तो क्यों नहीं मिटटी मै मिल जाने से पहले कुछ लोगो की ज़िन्दगी देकर कुछ भला करे । मैं अब सारे सीनियर सिटीजन्स को यही समझता हूँ की मरने के बाद हम अपने ऑर्गन डोनेट क्यों नहीं कर देते। ऑर्गन डोनेशन से कोई हानि नहीं है, जब जीवन ख़तम होता है तब मरने के पश्चात् कुछ घंटो तक हमारा शरीर चल रहा होता है, तब हम अपने शारारिक अंग दान से और लोगो की मदद कर सकते है।

अब मेरी बस यही ज़िद्द है की ज्यादा से ज्यादा लोगो को  प्रोत्साहित करू की वह इस नेक काम मै योगदान दे।

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