• October 28.2020

  • नरेंद्रपाल

चंडीगढ़ के जीएमएसएसएस-32 में हिंदी पढ़ाने वाले लेक्चरर नरेंद्रपाल शास्त्री का जीवन किसी प्रेरणा से कम नहीं। सात महीने की उम्र में ही उनके दोनों पैरों और एक हाथ ने काम करना बंद कर दिया था। इसके बावजूद उन्होंने संघर्ष किया। उन्होंने विभिन्न शहरों में जाकर पढ़ाई की। हिंदी और संस्कृत में उपाधि हासिल की।

वर्ष 2018 में जब चंडीगढ़ के स्कूलों का रिजल्ट खराब आया तो उन्होंने जीएमएचएस-31 का रिजल्ट सुधारने का बीड़ा उठाया। करीब 7 महीने की कड़ी मेहनत के बाद स्कूल के छात्रों का रिजल्ट 22 से 66 फीसदी पहुंचाया। उन्हें सीबीएसई अवार्ड, चंडीगढ़ का स्टेट अवार्ड और पुडुचेरी की गवर्नर किरण बेदी की ओर से भी सम्मान मिल चुका है। उनका नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज है। पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंश..

सवाल- अब तक का जीवन का सफर कैसा रहा
जवाब- मैं 7 या 8 महीने का था तब पोलियो की वजह से मेरे दोनों पैर और एक हाथ ने काम करना बंद कर दिया। मेरे भाई-बहन, माता-पिता और दोस्तों ने बहुत साथ दिया, जिसकी वजह से मुझे प्रेरणा मिली और मैंने पढ़ाई शुरू की। पंचकूला के पास स्थित बरवाला के एक छोटे से गांव से संबंध रखता हूं। पांचवीं तक की पढ़ाई गांव में ही की। बरवाला से दसवीं की।

अंबाला से संस्कृत में उपाधि हासिल की। इसके बाद चंडीगढ़ के बीएड कॉलेज से बीएड किया। काफी संघर्ष के बाद वर्ष 1994 में अध्यापक की नौकरी मिली। इसके बाद भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ। दिव्यांग होने से बसों में सफर करना बेहद मुश्किल था। अब लो फ्लोर बसें आ गई हैं लेकिन पहले ऐसा कुछ नहीं होता था। मैं 18 साल टीजीटी और 7 साल पीजीटी रहा हूं।

सवाल- अब तक का सफर कितना मुश्किल रहा
जवाब- मैंने कभी माना ही नहीं कि मैं दिव्यांग हूं। मेरी पत्नी भी दिव्यांग हैं। मेरे दो बेटे हैं। मैं कभी किसी पर निर्भर नहीं रहा। आज भी मैं अपने गांव खुद कार चला कर जाता हूं। मैंने कार को कस्टमाइज कराया है। सब कुछ हाथ से कंट्रोल होता है। मेरा मानना है कि हौसले और हिम्मत से किसी भी व्यक्ति का भाग्य बनता है। आज का मेहनत ही कल का भाग्य होता है। मैं हर काम करता हूं। किसी भी काम में एक नॉर्मल व्यक्ति से कम नहीं हूं।

सवालरू आपने उस वक्त स्कूल की कमान संभाली जब रिजल्ट खराब था, कैसे किया यह सब जवाबरू वर्ष 2018 में चंडीगढ़ के कई स्कूलों का रिजल्ट बहुत खराब आया था। इसकी वजह से शिक्षा विभाग के अधिकारी भी काफी सख्त थे। जीएमएचएस-31 के इंचार्ज बनने को लेकर बात चली तो कोई भी आगे नहीं आया, क्योंकि उस स्कूल का रिजल्ट सिर्फ 22 फीसदी था। ऐसे में सबको यह डर था कि अगर रिजल्ट अगले साल भी खराब होता है तो उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है। लेकिन मैंने तत्कालीन शिक्षा सचिव बीएल शर्मा के पास जाकर कहा कि मैं यह जिम्मेदारी लेना चाहता हूं।

मैं जीएमएसएसएस-32 में हिंदी का लेक्चरर था, वहां हिंदी पढ़ाता था। उसके बाद जीएमएचएस-31 में जाकर वहां इंचार्ज की जिम्मेदारी निभाता था। उस साल स्कूल का रिजल्ट 22 से 66 फीसदी तक पहुंच गया। इसके अलावा वह स्कूल 1983 में बना था लेकिन अभी तक स्कूल की बाउंड्री नहीं बनी थी। मैंने इंचार्ज बनने के बाद सबसे पहले स्कूल की बाउंड्री का काम करवाया।

सलाव- बीते सालों में शिक्षा व्यवस्था में कितना बदलाव आया है
जवाब- गुरु-शिष्य का वह रिश्ता खत्म हो रहा है, जो पहले हुआ करता था। अध्यापक को मिलने वाला आदर, सत्कार सब कम होता जा रहा है, बल्कि मैं बोलूंगा कि खत्म होने की कगार पर है। अध्यापकों में भी प्रेम भावना खत्म हो रही है। इसका बड़ा कारण बच्चों के माता-पिता है। माता-पिता स्कूल में बच्चों के सामने अध्यापकों को डांटते हैं, उनसे बदतमीजी से बात करते हैं, इसकी वजह से बच्चों के मन में भी अध्यापक के प्रति सत्कार की भावना कम हो रही है। इसके अलावा अध्यापकों पर कई तरह की बंदिशें हैं। बच्चे अध्यापक को कुछ भी कहे, उन पर कोई भी कमेंट पास करें लेकिन अध्यापक कुछ नहीं कर सकता। हालांकि पढ़ाई के तरीकों के तरीकों में काफी बदलाव आए हैं। अब शिक्षा स्मार्ट हो गई है।

सवाब- सरकार की तरफ से दिव्यांगों के लिए किये जा रहे प्रयास कितने सार्थक नजर आते हैं
जवाब- एक दिव्यांग को बेहतर मौके मिलने चाहिए। सरकार को उसे बढ़ावा देने के लिए काम करना चाहिए। क्योंकि मेरे जीवन में एक पल ऐसा आया था। संस्कृत में उपाधि लेने के बावजूद मुझे नौकरी नहीं मिली। 18 महीने तक मैंने संघर्ष किया। मैं हर अधिकारी के पास गया, फिर भी मुझे 18 महीनों तक घर बैठना पड़ा। मुझे लगता है कि कोई भी दिव्यांग बच्चा अगर अच्छी शिक्षा हासिल करता है तो इसके पीछे उसने बहुत कड़ी मेहनत होती है। एक आम विद्यार्थी से उसका संघर्ष कई गुना ज्यादा होता है। ऐसे में सरकार को उस विद्यार्थी को बहुत बढ़ावा देने की जरूरत है।

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