• April 1.2020

  • ADITYA JHA

सिविल सेवा यह शब्द सामने आते ही भारत के ग्रामीण मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चें की आंखें अद्भुत रोमांच के साथ चमक-सी उठती हैं। बिहार के सुदूर मधुबनी जिले के एक गांव लखनौर में प्रारंभिक बाल्यकाल बिताने वाला मैं भी उसी अद्भुत सिविल सेवा के स्वप्न, किवदंती, प्रतिष्ठा के रोमांच से अभिभूत हुआ।  मेरे पिताजी संस्कृत के प्रोफेसर हैं। घर में अब तक सभी संस्कृत के विद्वान शिक्षक ही हुए हैं।
जाहिर-सी बात है मेरे पिताजी के मन में हम 3 भाइयों के लिए कुछ अलग बनने की आकांक्षा थी। फलत: मुझे कक्षा 6 में बड़े भाई के साथ इलाहाबाद भेज दिया गया। जब इलाहाबाद पहुँचा तो मानो सिविल सेवा के प्रति बचपन से पड़े आकर्षण के बीज ने इलाहाबाद के उर्वर मिट्टी के संपर्क में आकर पौधे का रूप धारण कर लिया। मेरे अनुशासनप्रिय अग्रज खुद यूपीएससी की तैयारी में जुटे थे, तो यह संक्रामक रोग बहुत शुरूआत में ही मुझे लग चुका था। खैर अब मैं इंटरमीडिएट में पहुँच चुका था कुछ वर्षों के बाद। विषय के रूप में भूगोल, संस्कृत एवं राजनीति विज्ञान को बीए के विषय के रूप में चयनित किया।  उस समय सीसैट का अद्भुत आतंक था। कर्मकांड के मुताबिक दिल्ली के कोचिंग में भी गया। घटिया, गुणवत्ताहीन एवं स्तरहीन कोचिंग मार्गदर्शन के कारण तैयारी यूपीएससी के मुताबिक नहीं हो पाई।
इसी बीच 2013 में पाठयक्रम में बदलाव ने रणनीति, आत्मविश्वास को तोड़कर रख दिया। इन कारणों से राज्य सिविल सेवा की ओर रुख किया। इसी बीच आईबी में सहायक सेंट्रल इंटेलिजेंस आॅफिसर के रूप में पहली सफलता प्राप्त हुई। यह निर्णय किया कि आईबी जॉइन नहीं करनी है। इस बात पर मेरे पिताजी बहुत खफा हुए। खैर उनकी असुरक्षाबोध, नाराजगी के बीच यह जुआ मैंने खेला। सीसैट के प्रति मानसिक भय व हिंदी माध्यम में नगण्य रिजल्ट ने मिलकर मेरा समस्त आत्मविश्वास तोड़ डाला था। किंतु 2015 अद्भुत ऊर्जा के साथ सामने आया। इस वर्ष हिंदी माध्यम में निशान्त जैन द्वारा 13वीं रैंक की प्राप्ति, सीसैट आंदोलन की सफलता ने मेरे जैसे लाखों उम्मीदवारों को नवीन ऊर्जा प्रदान की। 3 वर्षों की निराशा पूर्णतया समाप्त हुई। सिविल सेवा परीक्षा में प्रथम प्रयास 2015 की मुख्य परीक्षा पूरे उत्साह से दी। अनेक परिश्रमी मित्रों का सर्किल भी तब तक बन चुका था। 2015 के मुख्य परीक्षा में चूकने के पश्चात दुगुने उत्साह से 2016 की परीक्षा दी। अब तक वैकल्पिक विषय संस्कृत पर ठोस पकड़ बन चुकी थी। टेस्ट सीरीज, सामान्य अध्ययन भी औसत से बेहतर हो चली थी। तभी उसी रात लगभग 9 बजे एक घातक दुर्घटना में पैर फ्रैक्चर हो गया। मैं शीघ्र ही अस्पताल तक पहुँच गया। फिर अगले दो माह बिस्तर पर पड़े-पड़े इंटरव्यू की अद्भुत तैयारी हो पाई। मॉक इंटरव्यू के लिए व्हीलचेयर पर अपनी बड़ी दीदी के साथ मुखर्जी नगर से राजेन्द्र नगर जगह-जगह घूमा। फिर 21 अप्रैल को सक्सेना सर के बोर्ड में व्हीलचेयर पर ही इंटरव्यू में सम्मिलित हुआ। इंटरव्यू बहुत ही औसत हुआ तथा सफलता की कोई आशा नहीं थी।
अंतिम परिणाम में जैसे ही अपना नाम 503वें स्थान पर देखा तो मानो सहसा विश्वास नहीं हुआ। जीवन में जो आंसू दर्जनों परीक्षा में फेल होकर नहीं बाहर निकले, वो सहसा ही द्वितीय प्रयास में सफलता के पश्चात फूट पड़े। खैर अब मेरा जीवन पूर्णत: बदल चुका था। मेरे पिताजी के जीवन की सबसे बड़ी साधना एक हद तक पूर्ण होती दिख रही थी। 2017 की सिविल सेवा परीक्षा में 431 रैंक पर ऊअठकउर सेवा हेतु चयन प्राप्त हुआ। इस प्रकार लगातार दूसरी बार चयन आत्मविश्वास बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ। वर्तमान में, ऊअठकउर सेवा में सेवारत हूं। चरैवेति चरैवेति के सिद्धांत पर प्रत्येक दिन, प्रत्येक एटेम्पट से कुछ नया सीखकर निरन्तर आगे बढ़ने को प्रयासरत हूँ।

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