• November 5.2019

  • KALPANA SAROJ

यह कहानी एक ऐसे स्त्री की है जो किसी खानदानी उद्यमी परिवार से नही है लेकिन फिर भी अपने दम पर अपनी किस्मत को बदल डाला। हम बात कर रहे है कल्पना सरोज जी की जो कि एक ऐसे समाज से आयी हैं जिसमें न तो ढंग का खाना नसीब था, न कपडा और न ही रहने के लिए घर था। आये जाने उन्ही की ज़ुबानी।
मेरा जन्म महाराष्ट्र के अकोला जिले के एक छोटे से गाँव रोपरखेड़ा के एक दलित परिवार में 1961 में हुआ था । मेरे पिता महाराष्ट्र पुलिस विभाग में हवालदार थे। छोटी ही उम्र में शादी हो गयी और शादी के बाद मुंबई के स्लम एरिया में रहने लगी। विवाह अधिक दिनों तक न चल सका और मैं वापस गाँव आ गईं। परिस्थितियां कठिन थीं, शारीरिक और मानसिक रूप से टूट गई थी, गाँव और समाज ने मुझे बहिष्कृत कर दिया। इस दबाव को झेल पाना मुश्किल होता गया और एक दिन आत्महत्या करने तक की कोशिश कर डाली। इस वक्त मेरी उम्र 16 वर्ष के करीब थी। मैं दोबारा से मुंबई आ गई और अपने रिश्तेदार के घर रहने लगी। तब मैंने सोच लिया की मुझे अपने आप के लिए जीना है और अपनी ज़िन्दगी बदलनी है । उस दिन के बाद मैंने पीछे मूढ़ कर नहीं देखा।
मुझे २०१३ में पद्मा श्री मिला। एक छोटे समाज से आयी एक महिला को औद्योग और व्यापार क्षेत्र में किये कार्यो के लिए पदम् श्री से सम्मानित कीया गया। लेकिन ये मिलने के लिए मुझे काफी ज़्यादा संगर्ष करना पड़ा। यह संगर्ष इतना ज़्यादा था की अगर कोई सुनता है तो हैरान होता है की वाकई कोई इंसान इतना ज़्यादा संगर्ष कर सकता है। कुछ लोगो को मेरा ये काम करना पसंद नहीं आया जिसके कारण मेरे नाम पर सुपारी तक दी गयी। लोगों को ये पसंद नहीं आता था की कोई महिला इतनी आगे बढ़ कर कैसे काम कर सकती है। मैंने बिल्डिंग उद्योग में कार्य किया जो की पुरषों का क्षेत्र है जिसकी कारण मुझे मारने की कोशिश भी की गयी। लेकिन मैंने अपनी ज़िद्द को कायम रखा और किसी भी कठनाईयो से डरी नहीं। हर चीज़ का सामना मैंने निडरता से किया। बिल्डिंग बनाने के कार्य में मैंने काफी कमाया। और इस तरह मेरे कमाने का सील सिला शुरू हुआ।

उस समय में दलित और पिछड़ो के उत्थान के लिए सरकार द्वारा योजनाएं चलाई जा रही थी। मैंने रोजगार के बारे में जानकारी जुटाना शुरू कर दिया। थोड़े संघर्ष के बाद मैं सरकारी अनुदान प्राप्त करने में सफल रही । सरकारी सहायता से सिलाई की दुकान शुरु कर दिया। थोड़े समय के बाद फर्नीचर व्यवसाय में कदम बढ़ा दिया। कड़ी मेहनत के बल पर फर्नीचर व्यापार में भी सफल हुई।

फिर कमानी ट्यूब लिमिटेड टेकओवर किया जो की पचीस साल से बंद पड़ी थी। यह फैक्ट्री 1960 में स्थापित हुई थी और 1985 से बंद पड़ी हुई थी। ये कंपनी मैंने कोर्ट से ली थी। २००६ में यह कंपनी मुझे दी गयी और २००९ में मैंने ये कंपनी स्टार्ट की। कामानी ट्यूब्स लिमिटेड को वापस लाभ की स्थिति में लेकर आई और अपनी काबिलीयत के झंडे गाड़ दिया। वर्तमान में कमानी ट्यूब्स 500 करोड़ रुपए से अधिक वैल्यू की कंपनी है।आज मुझे गर्व होता है ये बताते हुए कि आज मैं दो हज़्ज़ार करोड़ की मालकिन हूँ। जहां मैंने अपनी शुरआत महज दो रुपए से की थी, साठ रूपए महीना हुआ करती थी आज मेरी कई कंपनियॉं हैं जो करोड़ों का मुनाफा करती हैं। एक समय था जब पैसों की कमी के

करण पैदल चलना पड़ता थे और आज आलिशान गाड़ियों में घूमती हूँ। जब मैं गाँव से आयी थी तब मुझे बड़ी बड़ी सड़को को देख केर डर लगता था लेकिन आज मुंबई में मेरे नाम पर दो दो सड़के हैं। यह मेरे लिए बहुत ही गर्व की बात है।

कल्पन सरोज की ज़िन्दगी की ज़िद्द अटल थी और उसमें उन्होंने कामयाबी पायी। उन्हें अपने कार्यों के बदौलत देश में कई पुरस्कार प्राप्त हुए। 2013 में कल्पना सरोज को पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया। उनकी काबिलीयत को देखते हुए भारतीय महिला बैंक के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में रखा गया है। उन्होंने समाज में अपने जैसी महिलाओं के जीवन में भी बदलाव लाने के लिए कई कार्य करे हैं । वह गाँव की महिलाओं, पुरुषों को बिजनेस लोन की सहायता से खुद का स्वरोजगार करने की सलाह देती और जरूरत पड़ने पर सहायता भी करतीं। इन सभी कार्यों से कल्पना जी की पहचान समाजसेवी के रूप में भी की जाती है। उन्होंने पिछड़ो, आदिवासियों, बच्चों, बुजुर्गों एवं कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वालों के लिये बहुत काम किया। ऐसी ज़िद्द जज़्बा को सलाम।

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