ज़िद्द थी दुनिया की नज़रों में ऊँचा उठने की|
  • January 11.2019

  • Deepak Sharma

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अकेले ज़िंदगी बसर नहीं कर सकता। लोगों से घुलना-मिलना, उनके साथ वक़्त बिताना और मिल-जुलकर जशन मनाना हमारी फ़ितरत भी है और ज़रूरत भी। परन्तु हम सब ने अपनी ज़िंदगी मे कभी न कभी ख़ुद को अकेला महसूस किया है। अकेलापन एक ऐसी भावना है जिसमें लोग बहुत तीव्रता से खालीपन और एकान्त का अनुभव करते हैं। अकेलेपन मे जिंदगी व्यतीत करना किसी भी मनुष्य के लिए सही नहीं, ऐसे ही अकेलेपन से ग्रस्त दीपक शर्मा कि कहानी है ,जिन्होंने हार नहीं मानी बल्कि अपने को प्रोत्साहित कर आगे बढ़ने की ज़िद्द ठानी।

मेरी पहली नौकरी दिल्ली मे थी, बहुत मामूली वेतन से नौकरी की शुरवात करि थी। कार्यालय मैं कोई भी मुझसे बात-चित नहीं करता था।अनुभव कि कमी कि वजह से कोई मुझ पर ध्यान भी नहीं देता था।ऐसे पुरे दिन गुमसुम रहने की वज़ह से मैं अकेलापन महसूस करने लगा। कभी कभी परिस्थितिया इतनी खराब होती थी कि नौकरी छोड़ने का मन करता था। ऐसे अकेले रहने कि वजह से मैं चिड़चिड़ा रहने लग गया था। मेरे अंदर से आगे बढ़ने की इच्छा ही ख़तम हो चुकी थी।परन्तु कुछ वक़्त बिताने के बाद मैंने अहसास किया कि जो मैं कर रहा हूँ वह सही नहीं, मैंने एक ज़िद्द ठानी की अपने आप को उस मुकाम पर ले जाऊं कि लोग मेरे पास खुद आये। इतना तरजुरबा पा लूँ , इतना आगे बढ़ जाऊं कि मुझे कभी अकेलापन न महसूस हो।

मेरी इसी ज़िद्द ने मुझे आगे बढ़ने का होंसला दिया और इसी वजह से मैंने एक साल मैं इतनी तरकी कर ली जितनी लोग 6-7 साल मै करते है। ज़िद्द ऐसी चीज़ है जो अकेलेपन जैसी हताश स्तिथि को भी ख़तम कर सकती है। एक बात मैंने अपनी ज़िद्द से जरूर सीखी है कोई तुम्हारा साथ दे या ना दे परन्तु आपकी ज़िद्द ही है जो आपका साथ देती है ।

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